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Wednesday, 22 May 2013

- इश्क़ में गिरफ्तार

कल्पनाओ के फूल जब खिलने लगे,
घने वीराने में भी जब,
   कोई खूबसूरत मंजर नज़र आने लगे,
हवाओं में जब उँगलियों से,
     तस्वीर बनाने को जी चाहे,
तन्हा तनहाइयों में जब, आस-पास,
    जाना-अनजाना, साया महसूस हो,
ज़बां से निकले लफ्ज़ जब,
    शक्ल, ग़ज़ल की अख्तियार करने लगे,
गर्मी की ठंडी-ठंडी पुरवाई, जब,
    कोई धुन गुनगुनाती सी लगे,
गम भी जब,
    मीठा-मीठा दर्द जगाने लगे,
अकेलेपन से जब,
    गले मिलना चाहो,
दोस्तों के बीच रहते हुए भी,
     जब, बेख़ुद, तन्हा से रहने लगो,
हर प्यार करने वाला शख्स,
    जब, अपना अज़ीज़ लगने लगे,
इक मखसूस नाम सुनकर,
  जब, 
    होश हवा में परवाज़ करने लगे,
ख़ामोशी से जब तुम, 
    बहुत सी बातें करने लगो,
किसी के गम, अपनी खुशियों से भी,
                       प्यारे जब लगन्रे लगे,
तब,
समझो कि ज़माने की नज़र में,
                         तुम बेकार हो गये,
और किसी के इश्क़ में गिरफ्तार हो गये,
फिर,
प्यार या ज़िन्दगी,
  किसी एक को अलविदा कह देना,
और गर,
    टूटना न चाहो, 
         तो शायरी से दिल लगा लेना ||

                                 ---- "अर्पण" (6 jan. 1998)



Monday, 20 May 2013

- शिकायत

तुम्हे शिकायत है मुझसे,
     कि मैं बहुत कम बोलता हूँ,

मगर क्या कभी तुमने देखा है,
उस रोशनी को, जो मेरी आँखों में होती है,
                             जब मैं सुनता हूँ  तुम्हे |

कभी देखा है उस मुस्कराहट को,
      जो मेरे होंठों पर आती है,
                  जब हँसती हो तुम |

कभी देखा है उन लगज़िशो को,
            मेरी नीची निगाहों को,
       जब तुम साथ होती हो मेरे |


तुम्हे शिकायत है मुझसे,
     कि मैं बहुत कम बोलता हूँ.....

.....मगर,
          मुझे शिकायत है तुमसे,
       कि तुमने कभी सुना ही नहीं,
उस ख़ामोशी को, 
      जो कई बार मेरे लबों पर आई,
        जो कई बार मेरी आँखों में आई,
वो ख़ामोशी,
       जो कई बार हमारे दरम्यान आई,
                तुमने इसे कभी सुना ही नहीं,

मुझे शिकायत है तुमसे.......

                                          --- "अर्पण" (22 jan. 2001)



Thursday, 16 May 2013

- कुछ रिश्ते

क्या  है,  सच  में,  ये  रिश्ते  भी |
पीस देते है हमको, खुद है पिसते भी |

कुछ रिश्ते विरासत में अपने साथ हम लाते है,

कुछ रिश्ते विरासत में अपने साथ गम लाते है |


कुछ ऐसे रिश्ते है, जिन्हें हम ख़ुद चुनते है,
और कभी-कभी रिश्ते खुद हमें चुन लेते है |

कुछ रिश्तों को हम मुसीबत में आजमाते है,
और कुछ रिश्ते मुसीबत में हमें आजमाते है|

कुछ रिश्ते तन्हाई में बहुत याद आते है,
और कुछ रिश्ते तन्हा होते ही गायब हो जाते है|

कुछ रिश्ते मौसम बदलते ही बिछुड़ जाते है,
                                पतझड़ के पत्ते की तरह,
कुछ रिश्ते कभी जुदा नहीं होते,
                                दो मिले हुए रंगों की तरह |

कुछ रिश्ते कल्पना बनकर तस्वीर में उतरते है,
कुछ रिश्ते अहसास बनकर नगमों में ढ़लते है |

कुछ रिश्ते कल्पनाओं तक ही रह जाते है,
कुछ रिश्ते वक़्त के दरिया में बह जाते है,

कुछ रिश्ते दिल से निकल कर,
            ज़माने  के  सामने आते है,
और कुछ रिश्ते कभी-कभी
             डायरी के पन्नो तक ही रह जाते है |

कुछ रिश्ते किसी भी अपमान से नहीं टूटते,
और कुछ रिश्ते बिना किसी बात के टूट जाते है |

 रिश्तों की गहराई हम कभी-कभी समझ नहीं पाते,|
और कभी कुछ रिश्ते चाहकर भी समझ नहीं आते |



क्या  है,  सच  में,  ये  रिश्ते  भी |
पीस देते है हमको, खुद है पिसते भी ||

                              
                                               ...."अर्पण" (28 Apr. to 25 May 2001)

Thursday, 15 November 2012

याद आ रहे हो -2


जुदाई में आपकी क्या-क्या सह गए है,
प्यार  कर  के,  अब  हम  थक  गए  है,
तेरी   ही   गली   में  आकर  ठहर  गई,
हवा  के  संग  हम  जब - जब  गए  है,

खुशबू  से  महका  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

चाँद जाने क्यों आज उदास-उदास है,
हवा  में  भी आज अजीब सी प्यास है,
शब  कुछ   ज्यादा   गहरी   है   आज,
सहर आएगी, इसकी भी कहाँ आस है,

सांस  से  अटका  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

दिल का दर्द निकला आँखों के रास्ते,
क्या - क्या  मैं  सह  गया तेरे वास्ते,
ख़वाब  में  भी  कहाँ  सोचा  था  मैंने,
मेरी डगर से अलग होंगे  तेरे  रास्ते,

रास्ते से वापिस आ रहे हो |
तुम बहुत याद  आ रहे हो ||

बुलाता हूँ किसी को,नाम तेरा निकलता है,
आईने   में    भी  तेरा  अक्स   दिखता   है,
दिल  गायब  हो जाता है, सीने से हर रोज़,
ढूंढ़ता   हूँ  तो  तेरी  गली  में  मिलता   है,

अश्क से सूखते जा रहे हो |
तुम बहुत याद आ रहे  हो ||

                                                             -अर्पण (1 जनवरी 2000)








याद आ रहे हो -1



तुम  नहीं   हो   तो   कुछ   भी   नहीं  है,
है  सब - कुछ  मगर  फिर  भी  कमी है,
तुम क्या चले गए,कोई पास नहीं आता,
मैं  किसी  से, कोई  मुझसे खुश नहीं है |

तुम  ही  आ - जा  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

आँखें   बंद   करके  बैठा  हूँ  चुप-चाप,
कोयल भी  बहुत  चुप - चुप  है  आज,
उड़ने की कोशिश में फड़फड़ा भर पाये,
मेरी  सोच के परिंदे भूल गये परवाज़ |

तन्हाई  में  बुला  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

जहन अज्ञात की तरफ भागा जा रहा है,
मैं  दिल  को, दिल  मुझे  समझा  रहा है,
आँखें   है  तो  पत्थर,  मगर   गीली   है,
आँसू पानी होकर भी सुखा  जा  रहा  है |

आँसू   से  धुंधला  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

तुमसे ही रोशन थी मेरी सुबह-ओ-शाम,
इस   हिज्र   में   तेरे   प्यार  को  सलाम,
हर   दर्द ,  हर    गम    भूल   जाता   था,
आँखें बंद करके जब लेता था तेरा नाम |



रोम - रोम में समा रहे हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

                                                                  -अर्पण (28 मार्च 2000)






लौट आता हूँ मैं !



न जाने, क्या है तुझमे, बार - बार,
तुम्हारी तरफ, लौट  आता  हूँ  मैं |

कितना  ही  आपस  में झगड़ लें हम,
कितना ही एक-दूजे से रूठ जाए हम,
कितना    ही,  मैं    खा    लूँ    कसमें,
कि  एक - दूजे  से  नहीं  मिलेंगे हम,

कसमें  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||


हर  नापसंद   बात   पर   तुम्हे   डांटना,
मेरी  हर  डांट  पर  तुम्हारे  आँसू बहना,
वो  हर  पल  दुआएँ  करना  मिलने  की,
और जब भी मिलना तो लड़ना-झगड़ना,

झगड़े  भूल  जाता  हूँ   मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||


एक-दुसरे से बिल्कुल अलग है हम,
तुम  उतर  हो,  तो   मैं   दक्षिण   हूँ,
कैसे एक - दुसरे  से मिल जाएँ हम,
तुम  पूरब  हो  तो  मैं   पश्चिम   हूँ,

दिशाएं  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||


                                      -अर्पण (31 Aug. 1999 ) 









Wednesday, 14 November 2012

अभिलाषा

मेरी एक अभिलाषा है |


जो  किसी  भी  शख्स  को  नहीं बताई मैंने,
छुपाकर रखी है सबसे, दिल के तहख़ाने में,
सूरज  की  रोशनी  भी वहां तक जाती नहीं,
मेरा प्यार मसरूफ़  है उसे रास्ता दिखाने में,

निराशा  के बीच आशा है |
मेरी  एक  अभिलाषा  है ||

तन्हाई में मैं बस इसी से बातें करता हूँ,
जब ये बोलती है, चुप रह कर सुनता हूँ,
इसके  आँसू  पोंछना,  इस  को  मनाना,
 इसको खुशियाँ देना, बस यही करता हूँ,

आँखों  की  मूक  भाषा है |
मेरी  एक  अभिलाषा  है ||

ये अभिलाषा ले जाती है बादलों के उस पार,
कभी खींच लेती है, रिमझिम-2  बरसात में,
हंसती  है  जब  तो  पूरी  कायनात हंसती है,
रो  पड़ती  है  कभी - कभी  बात  ही  बात में,

दिल    की   जिज्ञासा    है | 
मेरी  एक  अभिलाषा  है ||

ये अभिलाषा, जो मेरी ज़िन्दगी का सार है,
जिसके  ग़मों  से  मुझे  बेइन्तहा  प्यार  है,
मेरी  रूह  के  सहरा  में   जो   भटकती   है,
यही  मेरी  प्यास,  यही  मेरा  आबशार*  है,

रूह      की      भाषा     है |
मेरी  एक  अभिलाषा  है ||

                                        -अर्पण (21st July 1999 )



*आबशार = मीठे पानी का झरना 





करीब

तुमने मेरी ज़िन्दगी में,
कदम क्या रखा,
मेरी सभी गमों की,
खुशियों से,
अच्छी-खासी दोस्ती हो गई है|

मेरे होश-ओ-हवास भी,
जब-तब इनकी,
बातचीत में शामिल हो जाते है,

अजीब सी हालत हो गई है,
ख़ुद अपनी ही आवाज़,
मुझे सुनाई नहीं देती,
ऐसी तन्हाई मिली है तुमसे,
जो किसी को तन्हाई भी नहीं देती,

रात-रात भर सितारों से,
तुम्हारे बारे में बातें करता हूँ,
सुबह-सुबह रश्मि भी आकर,
सबसे पहले,
तुम्हारे बारे में पूछती है,
चाँद तो पता नहीं क्यूँ,
आजकल, 
नाराज़ सा रहता है मुझसे,
शायद जलता है तुमसे,

अभी तो तुम, सिर्फ,
मेरी तरफ बढ़ रहे हो,
तो ये हालत है,
जब तुम मेरे बिल्कुल क़रीब होगी |
उस  दिन  मेरी  क्या  हालत  होगी ||

-अर्पण ( 18 july 1999)




Tuesday, 13 November 2012

अनमोल घड़ी !

तुम बदल जाओगे,
तो मेरे लिए, ये दुनिया ही बदल जाएगी |

मेरी दुनिया सिर्फ,
तुम तक ही सिमित है,
इस दुनिया में तो, मैं सिर्फ,
दिखाने  के  लिए  जीता  हूँ,

मगर,
तुम्हारी दुनिया की,
बात ही अलग है,

रातें महकती है मेरी,
तुम्हारी यादों की खुशबू से,
दिन की शुरुआत,
तुम्हारा नाम लेकर करता हूँ,

एक पल भी ऐसा नहीं गुजरता,
जब मैं तुम्हे याद नहीं करता,

तुम्हारी बातें, तुम्हारी खुशबू,
तुम्हारा पागलपन, तुम्हारी हसीं,
तुम्हारे आँसू, तुम्हारी भावनाएं,
तुम्हारी लड़ाई, तुम्हारा प्यार,
ये सब-कुछ मैं कैसे भुला पाऊँगा,

चाहता हूँ मैं बस इतना,
कि तुम्हे इस दुनिया से बचा लूँ,
तुम्हे दूँ सिर्फ हँसी, सिर्फ मुस्कुराहट,
बदले में मैं, कुछ भी नहीं चाहता,

लेकिन गर दोगी, तो,
इनकार भी कैसे कर पाऊँगा,
बल्कि मुझे ख़ुशी ही होगी,
और वो घड़ी,
मेरी ज़िन्दगी की, अनमोल घड़ी होगी ||

                                                    -अर्पण (10 जून 1999)














क्या रिश्ता है

जब से तुम गए हो,
कुछ भी अच्छा नहीं लगता,
अपना साया भी मुझे,
अब अपना सा नहीं लगता |

मगर हाँ,
तन्हाई से, 
इक अजीब सा,
रिश्ता बन गया है इन दिनों,

तुम्हारी सारी बातें,
तुम्हारे सारे किससे,
इनसे कहता-सुनता हूँ मैं,

ये भी अच्छे दोस्त की तरह,
मेरी सारी बातें सुनती है,
कभी-कभी तो,
सवाल भी करती है,
तुम्हारे बारे में,

इनसे बातें करना,
इनके साथ वक़्त गुजारना,
अच्छा लगता है,

कभी-कभी जी चाहता है,
इसे गले से लगा लूँ,
कि क्यूँ ये मुझे,
इतनी अच्छी लगती है,

कभी-कभी घुमने निकलता हूँ,
तो इसे भी साथ ले लेता हूँ,
लेकिन जब भी बाहर निकलता हूँ,
हर बार लोगों की आँखों में,
इक सवाल नज़र आता है,

और एक दिन यही सवाल,
लोगों की आँखों से निकलकर,
इसकी ज़बान पर आ गया - 

क्या रिश्ता है, तुम्हारा-उसका ? 

बड़े इत्मिनान से,
उसकी आँखों में आँखें डालकर,
मैंने कहा - 
                 मेरा और उसका वही रिश्ता है |
                 जो   मेरा   और   तुम्हारा    है ||

                                                -अर्पण (16 अप्रैल 1999)











ख़ुशी !

खुशियाँ ज़िन्दगी की,
किसमें है ?
        क्या है ?
           कैसे है ?,

खुशियाँ छिपी है,
त्योहारों में, मिलन में, प्यार में,
दोस्ती में, एक-दूजे के एतबार में,

ख़ुशी सपनों की, 
ख़ुशी अपनों की,

ख़ुशी पैसे की,
कभी-कभी ऐसे ही,

ख़ुशी खुशियों की,
कभी-कभी गम की भी,

ये खुशियाँ और,
कुछ ऐसी ही और खुशियाँ,
कितनी ख़ुशी देती है,
कभी-कभी तो आँसूं निकल आते है ||
                                                       -अर्पण (26 - 28 Feb 1999)


**************


ख़ुशी तुम वाकई खशी हो,
कितनी खुशियाँ दी है तुमने मुझे,
गम भी दिए,
तो वो भी मुस्कराकर,

कितने करीब हो तुम मेरे,
इतनी,
कि तुम्हारी सांसों की गर्मी,
को महसूस करता हूँ मैं,
फिर ठंडी सी आह भरता हूँ मैं,

ये सोचकर - कि तुम, तुम हो,
या कोई और ||

-अर्पण (28 Feb. 1999 )


***************










Sunday, 11 November 2012

सुबह


" सुबह "

सुबह के उजाले की पहली किरण,
मेरे दिल के अंदर तक,
उजाला भर जाती है,

आँखें खोलती हूँ,
तो उजाला, आँखों के रास्ते,
मेरे शरीर के,
कण-कण में फ़ैल जाता है,
और एक ताज़गी भरा अहसास जगाता है |

रात को,
कितने दुःख, कितनी तकलीफें,
कितने गम, कितने अँधेरे,
दामन में भरकर,
साथ ले कर सोती हूँ,

मगर सुबह उठती हूँ,
तो देखती हूँ,
कि,
सारे गम, सारे दुःख, सारी तकलीफें,
मेरे दामन से छिटक कर,
इक तरफ को पड़े,
अभी तक सो रहे है,

और सुबह के सूरज की किरणें,
एक-एक करके आती है,
और उन्हें उठाकर,
मुझसे दूर ले जाती है,
बिल्कुल मेरे एक दोस्त की तरह,

फिर सुबह के हाथों की,
गर्माहट भरी थपकी,
मैं अपने गालों पर,
महसूस करती हूँ,

जैसे कह रही हों -
हर सुबह,
ज़िन्दगी की इक नई शुरुआत है,
हम चाहें तो, ज़िन्दगी को,
कभी भी, कहीं से भी,
शुरू कर सकते है,

इस शुरुआत के लिए,
हमें बस इतना करना होगा |
ज़िन्दगी की खुशियाँ,
पाने के लिए,
पहला कदम, हमें ख़ुद उठाना होगा ||

                                          -अर्पण ( 1 May 1999 )

( ये कविता मैंने अपने एक दोस्त के कहने पर लिखी थी, उसने मुझे बताया की सुबह उसे बहुत अच्छी लगती है, एकदम ताज़गी भरे अहसास की तरह | जबकि रात को कितनी मुसीबतें, कितनी तकलीफें साथ होती है, सब कुछ सोच-सोच कर |  अपनी ज़िन्दगी के बारें में, अपने रिश्तों के बारें में सोच-सोच कर मन बहुत ख़राब होता है मगर हर सुबह इक नई उम्मीद लेकर आती है | ) 



दीवाली

भगवान करे......

तेरी सारी मुरादें, सारे सपने, सारी तमन्नाएँ |
दीवाली के दिन चल कर तुम्हारे  पास  आएँ ||

जो  भी  बीते  दिनों में तुमने खोया,
या  अनजाने   में   कहीं  छुट  गया,
सूख  गया  कोई   आँसूं   ख़ुशी  का,
या गम के आँसू की तरह बह गया |

जो भी बिछड़ा है तुमसे, वो सब मिल जाये |
दीवाली के दिन चल कर तुम्हारे पास आएँ ||

सारे ज़ख़्म तुम्हारे मुस्कराना  सीख लें,
होंठ  तेरे  हसीं  से  फिर  दोस्ती  कर लें,
अपनी  सारी  परेशानियाँ   मुझे   देकर,
मेरे हिस्से की खुशियों से झोली भर ले |

जो कुछ भी मेरा है,  सब  तुम्हें  मिल  जाए |
दीवाली के दिन चल कर तुम्हारे पास आएँ ||
  
                                                -अर्पण ( 1999 )





Saturday, 10 November 2012

नया साल ! 1999


लो आ गया नया साल,
अपने साथ नये दिन, 
नयी रातें भी लाया होगा |

मगर मैं चाहता हूँ,
ये नया साल, पुराने दिनों से,
वो लम्हे उधर ले ले,
जब हम तुम मिले थे,
जब हमने अपने सुख-दुःख,
आपस में बांटे थे |

जब मैं तुम्हारी ख़ुशी में हंसा था,
जब तुम मेरे गम में रोये थे |

मैं इन्हें बीते हुए दिन नहीं कहूँगा, 
ये मेरे लिए ज़िन्दगी भरे अहसास है,

जिन्हें मैंने,
बंद आँखों के गाँव में,
अहसासों के नील आसमां पर,
दोस्ती के बादलों के ऊपर,
एहतियात से रख छोड़े है |

जब दिल चाहता है,
आँखें बंद करता हूँ,
इन्हें महसूस करता हूँ,
और जी लेता हूँ |

लेकिन फिर भी दुआ करता हूँ,
नए साल के नए दिन,
और नई रातों के पल,
जैसे-जैसे गुजरे,

हमारा प्यार भी बढ़ता जाये,
टूटे   से   भी   टूट   न   पाए ||

                                                    -अर्पण 
(ये कविता मैंने अपने सभी दोस्तों के लिए लिखी थी )









Friday, 9 November 2012

कुछ रिश्ते

" कुछ रिश्ते "

कुछ रिश्ते सिर्फ रिश्ते है,

कुछ रिश्ते सिर्फ रिसते है|

कुछ रिश्ते पहाड़ से अटल है,

कुछ रिश्ते नम आँख से सजल है|

कुछ रिश्ते कतरा कर निकल जाते है,

कुछ रिश्ते आँसू की तरह,
गम में भी, ख़ुशी में भी निकल आते है|

कुछ रिश्ते शमां की तरह,

सारी - सारी रात जलते है,
कुछ रिश्ते सुबह का ख़वाब बनकर, नींदों में मचलते है |

कुछ रिश्ते हाथ से,

रेत की तरह फिसल जाते है,
कुछ रिश्ते बिन बुलाये हर मोड़ पर टकराते है |

कुछ रिश्ते दूर होकर भी पास है,

जैसे किसी मुफ़लिस की आस है |

मगर,

तुझमे और मुझमे जाने कैसा रिश्ता है,
तुम अजनबी भी नही,
      मुझे जानते भी नहीं,
हर लम्हा मेरे साथ रहते हो,
     और मुझे पहचानते भी नहीं |

इस रिश्ते को क्या कहूँ,

       तुम ही कुछ बताओ,
या फिर चलो,
  ये फैसला वक़्त पर छोड़ दे |
वो चाहे जिधर,
         इस रिश्ते का मुंह मोड़ दे ||

                                                -अर्पण (19-22 Dec. 1998)